सम्पादकीय

मैं मुन्नाभाई नहीं हूं...! ना ही मेरे दिमाग में कोई केमिकल लोचा है और ना ही मुझे महात्मा गांधी दिखते हैं। बस कुछ जागृत विचार है, जो मन-मस्तिष्क में चाहे-अनचाहे करवट बदलते रहते हैं। विचारों की यही करवट कलंक के कुहांसे से घिरी शिक्षा व्यवस्था पर कसक पैदा करती है। पहले कभी गलत और सही का भेद करना सिखाने को शिक्षा कहा जाता था, लेकिन आज शिक्षा वह है जो गलत को सही साबित करना सीखा दे। read more...