शनिवार, 15 जनवरी 2011

यहां अंधेरे से भी ज्यादा स्याह है उजाले!


मैं मुन्नाभाई नहीं हूं...! ना ही मेरे दिमाग में कोई केमिकल लोचा है और ना ही मुझे महात्मा गांधी दिखते हैं। बस कुछ जागृत विचार है, जो मन-मस्तिष्क में चाहे-अनचाहे करवट बदलते रहते हैं। विचारों की यही करवट कलंक के कुहांसे से घिरी शिक्षा व्यवस्था पर कसक पैदा करती है। पहले कभी गलत और सही का भेद करना सिखाने को शिक्षा कहा जाता था, लेकिन आज शिक्षा वह है जो गलत को सही साबित करना सीखा दे। जब सही और गलत की परिभाषाएं ही बहुरूपिया हो गई हंै, तो भला किसे दोष दें। वैसे तो हर क्षेत्र में सत्य सिद्धांत, स्वाभिमान, सरोकार और सभ्यता में गिरावट आई है, लेकिन बीते कुछ सालों में शिक्षा व्यवस्था के बारे में जितना जाना-समझा-परखा, उतना ही इस पर से भरोसा डगमगाता गया।

पुरानी बात है, लेकिन बैचेनी सी हुई जब देखा कि स्कूली शिक्षा के एक राज्य स्तरीय बोर्ड में एक ईमानदार और नए-नवेले सचिव को इस बात के लिए सस्पैंड करने की नोटशीट जारी कर दी गई कि उसने बोर्ड में बिना आवेदन व परीक्षा के बनने वाली फर्जी मार्कशीट का रैकेट और पर्चा आउट होने में बोर्ड के ही अधिकारियों को हाथ पाया। बेचारगी महसूस कि जब देखा कि चंद कॉलेज मिलकर तकनीकी विश्वविद्यालय के एक कुलपति । जो अब हट चुके है। का फैसला करते या करा लेते हैं। कोई क्या करें जब किसी कुलसचिव का ही एक कॉलेज हो! कुलसचिव की ही धर्मपत्नी एक अन्य कॉलेज में डायरेक्टर की पोस्ट पर हो और स्वार्थ के बाजार में सौदा मेहरबानी के बदले मेहरबानी के नाम होता रहे। छटपटाहट हुई जब देखा कि एक विश्वविद्यालय के उपकुलसचिव को इस बात के लिए तबादले की सजा मिलती है कि उसने फर्जी मार्कशीट बनाने के रैकेट में अपने ही कुलसचिव का हाथ साबित करने वाली फाेंपकड ली। इन बातों के कोई सबूत नहीं थे, इसलिए सच घुटता ही रहा।

फिर भी इन समस्याओं के जवाब तो हो सकते हैं, लेकिन समाधान नहीं, क्योंकि जवाब और समाधान के बीच का जो काकस है, वो किसी को कुछ करने नहीं देता। एक पूर्व कुलपति कहते हैं कि जो भी कुलपति बनता है, उसे भ्रष्टाचार करना ही पडता है और जो नहीं करता वो ज्यादा दिन चल नहीं पाता। वैसे बीते दस सालों में हर विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरने के कारण छह से आठ कुलपति बदलने का रिकार्ड तो किसी को भी बेदाग नहीं रहने देता। वह भी उस स्थिति में जबकि प्रत्येक कुलपति का कार्यकाल चार साल का रहता है।

खैर, ऐसा भी नहीं है कि हर ओर शिक्षा कंलकित ही है। शिक्षा के अपने उजियारे भी है, जो आने वाले भविष्य को बचाए रखने की उम्मीदों को खत्म नहीं होने देतें। ऐसे लोग भी हैं, जो शिक्षा के उद्धार के लिए अपना कर्म कर रहे हैं। ये और बात है कि बेबसी उन पर हावी है, इसलिए अपने दायरे में रहकर काम करने में ही भला समझते हैं। वो उनकी तासिर है, लेकिन हम दायरे बढाने में यकीन रखते हैं। वो सीमाओं में सिमटे रहे, लेकिन दायरे बढेंगे और हम बढाएंगे भी, इस उम्मीद में कि अकेले निकले है, तो क्या हुआ कहीं न कहीं कोई कारवां तो बन ही जाएगा।


इसीलिए अंत में दुष्यंत कुमार की चंद लाइनों में-

वो मुतमईन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता,

मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए।